प्राकृतिक खेती में देश में हिमाचल और प्रदेश में कांगड़ा सबसे अव्वल, रंग लाने लगी आत्मा प्रोजेक्ट के अधिकारियों की मेहनत
कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)- हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में आत्मा प्रोजेक्ट के अधिकारियों द्वारा प्रेरित करने पर रासायनिक खेती को छोड़कर प्राकृतिक खेती कर रहे किसानों की पौ-बारह नजर आ रही है, इसलिये क्योंकि इन किसानों के साथ खुद आत्मा प्रोजेक्ट के कांगड़ा प्रमुख कृषि विशेषज्ञ डिप्टी डायरेक्टर साइंटिस्ट डॉ आरके भारद्वाज खुद कंधे से कंधा मिलाकर खड़े नजर आ रहे हैं, जहां-जहां भी किसानों ने इस बार उनकी अगुवाई में प्राकृतिक खेती को अपनाया है वहां-वहां जाकर डॉ आरके भारद्वाज ये सुनिश्चित कर रहे हैं कि उन किसानों को मंडियों में गेहूं बेचने के लिये कोई दिक्कत-परेशानी का सामना तो नहीं करना पड़े रहा, इसी कड़ा में डॉ भारद्वाज ने फतेहपुर आनाज मंडी में जाकर विभागीय तैयारियों की जांच-पड़ताल की और मंडी में अपनी गेंहू बेचने पहुंचे किसानों को भी प्रोत्साहित किया, वहीं प्राकृतिक खेती अपना चुके किसानों ने भी अधिकारी को अपने बीच पाकर उनका फीता कटवाकर भव्य स्वागत किया…
किसानों को रसायनिक खेती से प्राकृतिक खेती में लाना कोई आसान नहीं थी राह- भारद्वाज
डॉ आरके भारद्वाज ने कहा कि रसायनिक खेती कर रहे किसानों की अमूमन फसल की पैदावार प्राकृतिक खेती से कहीं ज्यादा अधिक होती है क्योंकि उसमें कई तरह की कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग होता है जबकि प्राकृतिक खेती पूरी तरह से जैविक खादों पर आधारित होती है इसमें रसायनिक खादों का कोई प्रयोग नहीं होता, ऐसे में किसान इसे घाटे का सौदा समझता आया है, मगर जिस तरह से प्रदेश सरकार ने सराहनीय कदम उठाते हुये प्राकृतिक फसलों के समर्थन मूल्य में ढाई गुणा बढ़ौतरी की है उससे किसानों को बहुत हद तक प्रोत्साहन मिला है, रसायनिक तरीके से तैयार हुई गेहूं का समर्थन मूल्य जहां मार्केट में 24 रुपये प्रति किलो है वहीं प्राकृतिक गेहूं का समर्थन मूल्य सीधे 60 रुपये प्रति किलो कर दिया गया है ठीक वैसे ही हल्दी के भी दाम हैं जिससे उत्साहित होकर किसान अब प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ा है, भारद्वाज ने कहा कि जहां देशभर में प्राकृतिक खेती करने वाला हिमाचल प्रदेश पहला राज्य बना है वहीं 64 मीट्रिक टन प्राकृतिक गेहूं की पैदावार करने वाला कांगड़ा हिमाचल प्रदेश का पहला जनपद बनने जा रहा है, अभी तक अढाई सौ से ज्यादा किसान पंजीकरण करवा चुके हैं और 51 हजार के करीब किसानों ने प्राकृतिक खेती अपनाई है, इससे बड़ी उपलब्धि उनके लिये और क्या हो सकती है…
प्राकृतिक खेती कर रहे किसानों में भी नजर आ रही उत्सुकता
प्राकृतिक तौर पर तैयार की गई गेहूं और हल्दी को लेकर आनाज मंडियों में पहुंच रहे किसानों के चेहरों पर रौनक और उत्सुकता देखते ही बन रही है, किसान पवन कुमार ने बताया कि प्राकृतिक खेती करते हुये उन्हें चार से पांच साल हो गये हैं शुरूआती दौर में बेहद डरे सहमे से थे मगर आज उन्हें किसी भी तरह का कोई संदेह नहीं है कि निकट भविष्य में इस खेती की डिमांड और ज्यादा बढ़ने वाली है, रीता शर्मा ने बताया कि प्राकृतिक खेती करके उन्हें बेहद सुखद आभाष हो रहा है अब वो रासायनिक खादों का प्रयोग नहीं कर रहे इससे जहां सरकार उन्हें ढाई गुणा दाम ज्यादा दे रहे हैं वहीं कई तरह की बीमारियों से भी ये रोकथाम करेंगी, किसान रणजोध सिंह ने कहा कि प्राकृतिक खेती की ओर लाकर सरकार ने उनका भला ही किया है मगर अब अच्छा होगा कि जंगली जानवरों से भी उनकी खेती के बचाव का कोई प्राकृतिक हल निकाला जाये, तो वहीं किसान औंकार सिंह ने बताया कि आज की तारीख में मार्केट में हर चीज रसायनिक मिल रही है और अगर आज प्राकृतिक खेती को नहीं अपनाया गया तो बहुत जल्दी लोग कई तरह की बीमारियों से ग्रसित हो जाएंगे और इसका सीधा असर हमारी भावी पीढ़ी पर भी पड़ेगा, इसलिये प्राकृतिक खेती करना बहुत जरूरी है…औंकार सिंह ने बताया कि रसायनिक खेती की बजाय प्राकृतिक खेती करके उनके पास पैदावार कम हो रही हो मगर जो हो रही है वो बेहद बेशकीमती है और ये हमारे शरीर के लिये भी बेहद लाभदायक सिद्ध होगी…
साढ़े 12 प्रतिशत से ज्यादा नमी की गेहूं नहीं हो रही स्वीकार- एटीएम विशाल
आत्मा प्रोजेक्ट के तहत आनाज मंडी फतेहपुर में अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे एटीएम विशाल शर्मा की मानें तो जो भी किसान गेहूं लेकर उनके पास आ रहे हैं वो अपने कार्यालय में गेहूं की नमी को जांच रहे हैं जिसमें साढ़े 12 फीसदी से कम नमी वाली गेहूं ही खरीदी जा रही है जबकि इससे ऊपर वाली नमी की गेहूं को दोबारा सुखाने की अपील की जा रही है ताकि सरकार के पास जो भंडारण हो उसमें किसी तरह का कोई चूना न लगे…
रसायनिक खेती से प्राकृतिक खेती में स्विच करना बेहद सराहनीय कार्य
काबिलेगौर है कि आज देश में डिमांड ज्यादा और उत्पाद कम होने के चलते ज्यातर खाद्य वस्तुएं मिलावटी ही घरों तक पहुंच रही हैं ऊपर से मुनाफाखोर लोगों की जिंदगियों की परवाह किये बगैर कई तरह के गैर कानूनी कार्य करके भी ये डिमांड मार्केट में पूरी कर रहे हैं जिसका असर भी इंसानी जिंदगियों में साफ देखा जा रहा है, आज फल-सब्जियां या डिब्बा बंद आनाज़, मिल्क प्रोडक्ट हों या ब्रैड और फ्रूट्स पैक हर एक चीज में किसी न किसी रूप में कम या ज्यादा मात्रा में रसायन की मिलावट निश्चित तौर पर देखने को मिलती है, लिहाजा ऐसी स्थिती में प्राकृतिक उत्पादों की ओर सरकारों का किसी न किसी प्रोजेक्ट के जरिये रुझान दिखाना बेहद सराहनीय है…सरकार के ऐसे फैसलों की सराहना हर लिहाज़ से की जानी जरूरी हैं और उन अधिकारियों को भी सरकार द्वारा सम्मानित करने की निहायत जरूरत है जो ऐसे कार्यों को अंजाम तक पहुंचाने में अपना रात-दिन एक कर रहे हैं, नतीजतन परिणाम सकारात्मक ही देखने को मिलेंगे…
ब्यूरो रिपोर्ट डिजि मित्रा इंडिया
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