सिरडी के पीड़ित परिवार को मिला MGMS एनजीओ का साथ, फिर से पटरी पर लौटी जीवनपथ पर बेपटरी होती लाचार जिंदगी
भरमौर (हिमाचल प्रदेश) जनजातीय क्षेत्र भरमौर के शिरड़ी गांव निवासी जीत राम ने गैर सरकारी संगठन मेरा गांव मेरा स्वाभिमान संस्था का अभार व्यक्त करते हुये कहा है कि आज उन्हें बेहद खुशी है कि इस संस्था ने मेरे परिवार को गोद लेकर कंगाली में आटा गीला होने से बचाया है, जीत राम ने कहा कि एक दशक पहले जब उनका स्वास्थ्य खराब हो गया और वो अपने परिवार के भरण पोषण से लाचार हो गये तो उनकी धर्मपत्नी ने परिवार को सहारा दिया, मगर कुछ महीने पहले जब उनका आक्समिक निधन हो गया तो उनके ऊपर तो मानों मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा था, पांच प्राणी टब्बर का भरण पोषण अचानक से कैसे होगा यही चिंता उन्हें रात-दिन सताया करती थी, इसिलिये भी क्योंकि उनकी दो जवान बेटियां अपनी बारहवीं की पढ़ाई मुकम्मल कर घर बैठने को मजबूर थीं जबकि बेटा 10वीं के बाद स्कूल जायेगा कि नहीं ये बहुत बड़ा यक्ष प्रशन था,
जीत राम की मानें तो हालांकि प्रशासन की ओर से उन्हें फौरी राहत प्रदान की गई थी मगर वो जहां एक और ऊंट के मुंह में जीरे के सामान थी तो वहीं वो सिर्फ एक समय अवधि के लिये ही थी और उससे उनकी दवाइयों, खाने-पीनी और बच्चों की शिक्षा का स्तर बढ़ा पाते ये संभव नहीं था, इसिलिये उन्हें खुद की और परिवार की जिंदगी बोझिल लगने लगी थी, मगर अब मेरा गांव मेरा स्वाभिमान संस्था ने उन्हें संजीवनी देने का काम किया है…ये संस्था उनके परिवार के लिये लक्ष्मण को जीवनदान देने वाले रामभक्त हनुमान से कम नहीं है…और संस्था द्वारा भेजी गई राशि की पहली किश्त भी उन्हें पहुंच गई है जिसके लिये वो इस संस्था के बेहद अभारी हैं…
परिवार की बड़ी बेटी ने की तस्दीक, संस्था द्वारा भेजी धनराशि की पहली किश्त पहुंची उनके पास
पीड़ित परिवार की बड़ी बेटी राखी ने बताया कि कुछ दिन पहले मेरा गांव मेरा स्वाभिमान संस्था के कुछ लोग उनके पास आये थे और परिवार की माली हालत को मद्देनजर रखते हुये हमारे परिवार की जानकारी एकत्रित की थी, उसके कुछ दिन बाद उन्हें संस्था की ओर से एक पत्र मिला जिसमें उनके परिवार को गोद लेने की बात कही थी और उनके दुख तकलीफों को बांटने का आश्वासन दिया साथ ही परिवार की दवा-दारू और शिक्षा-दिक्षा में भी पूरा सहयोग करने की बात कही…आज संस्था की ओर से किये गये वायदे के मुताबिक उन्हें धनराशि की पहली किश्त भी मिल गई है जिसके लिये वो संस्था के बेहद अभारी हैं…
क्या कहते हैं संस्था के चेयरमैन मेद सिंह ?

मेरा गांव मेरा स्वाभिमान संस्था के चेयरमैन मेद सिंह की मानें तो उनका बचपन बेहद गरीबी और संघर्ष में गुजरा है, वो खुद जनजातीय क्षेत्र के दुर्गम गांव से संबंध रखते हैं, ऐसे में उन्होंने संकल्प लिया था कि वो अपने जीवन में कड़ी मेहनत और पूरी ईमानदारी के साथ ऐसी पढ़ाई करेंगे जिससे किसी भी परिवार को धन की चिंता न करनी पड़े और धन के अभाव में उनकी खूबसूरत जिंदगी में ग्रहण न लगे…शायद यही वजह है कि ईश्वर ने उनकी इस प्रार्थना और संकल्प को मुकम्मल करवाने में उनका भरपूर सहयोग दिया, उनकी पूरी पढ़ाई वित्तिय मामलों से संबंधित है और आज वो वित्तिय मामलों के अच्छे जानकार भी हैं…मेद सिंह ने कहा कि मानव जीवन में परिवार को चलाने के लिये अर्थ का क्या महत्व है, इस बात को वो आज बाखूबी समझ चुके हैं और लोगों को इस बाबत जागरूक भी कर रहे हैं…इतना ही नहीं मेद सिंह ने कहा कि आज उन्हें इस बात की बेहद खुशी है कि उन्होंने मेरा गांव मेरा स्वाभिमान संस्था जिस मकसद के लिये बनाई है उसे पूरा करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं और शिरड़ी गांव के असहाय और लाचार परिवार को गोद लेकर अपने संकल्प का पहला चरण भी शुरू कर दिया है
हालांकि सफर बहुत लंबा है लेकिन शुरूआत करना बेहद मुश्किल होता है, फिलहाल ये मेरा पहला कदम है और ईश्वर ने चाहा तो आज हम एक परिवार को गोद लेने में सक्षम हुये हैं कल अनेकों ऐसे परिवारों के घरों में दिया जलाने के काबिल बनेंगे जो आज हमारे समाज को सशक्त करने वाली व्यवस्था के मोहताज होकर लाचार और असहाय जिंदगी जीने को मजबूर हैं…
REPORT BY
रिशू शर्मा, डीजी मित्रा इंडिया भरमौर
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