जिंदगी की जंग लड़ रहे जीत को मेरा गांव मेरा स्वाभिमान NGO का मिलेगा सहारा
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हिमाचल प्रदेश के जनजातीय क्षेत्र भरमौर के पूलन निवासी 50 वर्षीय जीत राम का उनके मां-बाप ने बचपन में बड़े ही लाड़-प्यार से जीत राम नाम रखा, मगर जीत को शायद ही ये भान रहा होगा कि कभी जिंदगी एक पड़ाव पर आकर उसको इस कद्र इम्तिहानों के दौर से गुजारेगी कि उसकी जिंदगी के कठिन संघर्ष की जंग जीतना ही उसके जीवन का एकमात्र ध्येय बन जायेगा, लिहाज़ा जीत राम के सामने आज कुछ इस तरह के सूरते-हाल बन चुके हैं कि उनको जिंदगी का एक-एक पल काटना भी जनजातीय क्षेत्र भरमौर के पहाड़ों की मानिद प्रतीत हो रहा है…

आखिर कौन हैं जीत राम और क्यों लड़ रहे हैं जिंदगी से जंग

जनजातीय क्षेत्र भरमौर के पूलन निवासी और पेशे से दिहाड़ी मजदूरी का काम करके अपनी धर्मपत्नी, तीन बेटियों और एक बेटे समेत 6 प्राणी परिवार का भरण पोषण करने वाले जीत राम का साल 2016 तक सबकुछ सही चल रहा था, अचानक से उन्हें एक ऐसी गंभीर बीमारी ने जकड़ लिया कि चिकित्सा विशेषज्ञों ने उन्हें घर पर बैठकर बैड रैस्ट की सलाह दे दी, नतीजतन घर का मुखिया होने के चलते और अचानक से मुसीबतों का पहाड़ टूटने के कारण जीत राम अपाहिज हो गये और घर की अजीविका का सारा दारोमदार उनकी धर्मपत्नी के कांधों पर आ गया, जीत राम की दुख तकलीफों की इतिश्री यहीं नहीं हुई, अभी जीत राम का इलाज़ चल ही रहा था कि अचानक से एक दुर्घटना ने उनकी धर्मपत्नी उषा देवी को भी उनसे छीन लिया, लिहाज़ा अब घर का सारा दारोमदार जीत राम के बच्चों पर आ चुका है और पढ़ाई की उम्र में अब इन बच्चों को दौड़-धूप करनी पड़ रही है…

क्या कर रहे हैं जीत राम के बच्चे
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जीत राम की वर्तमान आय़ु 50 साल की है और वो गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं, जीत की जिंदगी की किरण धर्मपत्नी उषा भी उनके साथ बंधी पवित्र डोर को तोड़कर इहलोक से परलोक सिधार चुकी हैं, अब ऐसे में घर के बच्चों पर ही सारा दारोमदार है, जीत के चार बच्चे हैं जिसमें से 20 वर्षीय बड़ी बेटी राखी दो साल पहले 12वीं पास करके पहले ही घर संभाल रही है, 18 साल की साखी ने इस साल ही 12वीं पास करके अब घर की जिम्मेदारियों में रम गई है जबकि वो आईटीआई करना चाह रही थी मगर घर की माली हालत देखते हुये वो अब ऐसा कर पाने में अक्षम है…मानवी अभी 12 साल की है और 8वीं कक्षा की पढ़ाई कर रही है जिसके सामने फीस देने तक की चुनौती है, तो वहीं इस घर के इकलौते चिराग अरमान 15 साल के हैं मगर जिम्मेदारियां कुछ इस कदर उनके कांधों पर आ चुकी हैं कि अभी फर्स्ट डिवीजन में 10वीं पास करने के बावजूद भी आगे की पढ़ाई करना उन्हें न के बराबर प्रतीत हो रहा है…इसलिये क्योंकि अगर अरमान स्कूल जाते हैं तो उनकी वित्तिय मदद कौन करेगा ये उनके लिये सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है…

जीत की जिंदगी को सुगम बनायेगी मेरा गांव मेरा स्वाभिमान संस्था

जनजातीय क्षेत्र भरमौर की शिरड़ी पंचायत से ताल्लुक रखने वाले जीत की लाचार और असहज जिंदगी को सुगम बनाने के लिये मेरा गांव मेरा स्वाभिमान संस्था सामने आई है…इस संस्था के संचालक मेद सिंह ने बताया कि जैसे ही उन्हें जीत राम के परिवार की दयनीय स्थिती की जानकारी मिली उन्होंने इंसानियत के नाते तुरंत परिवार से मिलना मुनासिब समझा और जीत राम की रोजमर्रा की जिंदगी पर विस्तृत चर्चा की, मेद सिंह ने बताया कि क्योंकि जीत राम का हर महीने मेडिकल उपचार हो रहा है जिस पर उनकी आमदनी अठन्नी में से खर्चा रुपेया नहीं बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा हो रहा है, बकाया परिवार के सदस्य अपने-अपने करियर को दांव पर लगाकर घर-परिवार की जिम्मेदारियों को ही संभालने में जुटने शुरू हो चुके हैं, घर की वित्तिय स्थिती ठीक न होने के कारण बच्चों ने अपनी-अपनी पढ़ाई और सुनहरे सपनों को ताक पर रख दिया है…ताकि परिवार को टूटने से बचाया जा सके, मेद सिंह ने कहा कि जिन बच्चों की उम्र आज खुले आसमां में कुलांचे भरने की थी आज वो घर की चारदिवारी में परिवार को समेटने में जुटते नजर आ रहे हैं जो कि बेहद असहनीय है…इस पीड़ा को भांपते हुये उन्होंने इस परिवार की हर लिहाज़ से मदद का बीड़ा उठाया है, और अपनी संस्था मेरा गांव मेरा स्वाभिमान के जरिये इस परिवार को गोद लेने का विकल्प दिया है…ताकि समाज से बिमुख हो रहे इस परिवार को फिर से समाज की मुख्यधारा के साथ जोड़ने में मदद मिल सके…
रिशू शर्मा, भरमौर, डीएमआई

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